पारंपरिक संस्कृति के धनी ट्रांसगिरि क्षेत्र में रहेगी एक सप्ताह तक रौनक ddnewsportal.com

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फाइल फोटो: बूढ़ी दिवाली पर मशाल यात्रा निकालते गिरिपार क्षेत्र के ग्रामीण।

गिरिपार क्षेत्र मे 24 नवंबर से शुरु होगा बूढ़ी दीवाली पर्व

पारंपरिक संस्कृति के धनी ट्रांसगिरि क्षेत्र में रहेगी एक सप्ताह तक रौनक, ये होते हैं मुख्य व्यंजन...

पारम्परिक संस्कृति के धनी जिला सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र के हाटी समुदाय के लोगों ने बुढ़ी दिवाली की लगभग पूरी कर ली है। 24 नवंबर से क्षेत्र की अधिकतर पंचायतों मे मशाल यात्रा से बुढी दिवाली पर्व शुरु हो जाएगा। नई दिवाली के ठीक एक माह बाद पूरे गिरिपार क्षेत्र मे मनाये जाने वाले इस अहम पर्व की तैयारियां क्षेत्र के लोगों ने पूरी कर ली है। गृहणियों ने इस पर्व पर परोसे जाने वाले मुख्य व्यंजन मुड़ा व शाकुली बनाने का कार्य पूरा कर लिया है। शहरी क्षेत्र में 24 अक्तूबर को दीपावली का त्यौहार धूमधाम से मनाया गया। परंतु गिरिपार के करीब 3 लाख हाटी समुदाय के लोग अब 24 नवंबर से बूढ़ी दीवाली मनाने जा रहे है। बूढ़ी दीवाली का यह त्यौहार सिरमौर जिले के गिरिपार के घणद्वार, मस्त भौज, जेल-भौज, आंज-भौज कमरउ, शिलाई, रोनहाट व संगड़ाह क्षेत्र के अलावा उतराखंड के जौंसार बाबर में भी मनाया जाता है। बूढ़ी दीवाली के इस त्यौहार को परंपरागत तरीके से

मनाने के लिए क्षेत्र के ग्रामीण कई दिन पहले से ही तैयारी में जुट जाते है। इन दिनों ग्रामीण अपने घरों लिपाई-पुताई कर रहे है। बूढ़ी दीवाली का पांरपरिक मुड़ा है जो कि गेंहू को उबालकर सुखाने के बाद कड़ाही में भूनकर तैयार किया जाता है। इस मूड़े के साथ अखरोट की गीरी, खील, बताशे व मुरमुरे आदि मिलाए जाते है। बूढ़ी दीवाली के दिन लोग सुबह उठकर अंधेरे में लोग घास व लकड़ी की मशालें जलाकर एक जगह में एकत्रित हो जाते है। अंधेरे में ही माला नृत्य गीत व संगीत का कार्यक्रम शुरू हो जाता है। कुछ घंटो तक टीले व धार पर लोकनृत्य व वीरगाथाएं गाकर लोग वापस अपने गांव के सांझा आंगन में आ जाते है। इसके बाद दिनभर लोकनृत्य का कार्यक्रम होता है। एक दूसरे से मिलकर दीवाली की बधाई दी जाती है। हांलाकि अब कुछ क्षेत्र में लोग शहरी संस्कृति के चलते दीवाली ही मनाते है। क्षेत्र मे यह पर्व 3 से 7 दिन तक मनाया जाता है।